Explainer: क्या होती है गरीबी और क्या महागरीबी, कैसे तय होता और बदलता रहा है इनका मानक

हाइलाइट्स

1971 में देश की 50 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीच गुजर बसर करने को मजबूर थी.
गरीबी रेखा को लेकर कई परिभाषाएं सामने आईं, जिनसे देश में गरीबी को आंकने का पैमाना बदलता रहा.
कोरोना महामारी के दौर में सरकार ने गरीबों और वंचितों के लिए मुफ्त अनाज की व्यवस्था की.

इंदिरा गांधी 1971 में तीसरी बार ऐसे समय प्रधानमंत्री बनी थीं, जब आर्थिक और राजनीतिक रूप से देश बेहद नाजुक हालात से गुजर रहा था. जब आम चुनाव हुए तो भारत की आबादी 56.79 करोड़ थी. देश की 50 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीच गुजर बसर करने को मजबूर थी. लेकिन किसे गरीब माना जाए और किसे नहीं यह बड़ा मसला था. इसी दौरान दो अर्थशास्त्रियों वी. एम. दांडेकर और एन. रथ ने पोषण को आधार मानते हुए कैलोरी की खपत के आधार पर गरीबी का आकलन कर विमर्श को बदल दिया था.

1971 में वी. एम. दांडेकर और एन. रथ ने तर्क दिया कि गरीबी रेखा का निर्धारण ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में 2,250 कैलोरी रोजाना की जरूरत पर होने वाले खर्च के आधार पर होना चाहिए. उन्होंने अपने इस फॉर्मूले के आधार पर पाया कि ग्रामीण क्षेत्र की एक-तिहाई आबादी और शहरी क्षेत्र की आधी आबादी को कैलोरी के आधार पर पर्याप्त भोजन नहीं मिलता.

गरीबी के लिए क्या मानक तय किए
सुदीप ठाकुर की किताब ‘दस साल, जिनसे देश की सियासत बदल गई’ के अनुसार राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (national sample survey organisation, एनएसएसओ) ने 1960-61 के घरेलू खर्च और रोज की भोजन की जरूरत के आधार पर ग्रामीण क्षेत्र के लिए प्रति व्यक्ति 170.80 रुपये सालाना यानी 14.20 रुपये मासिक न्यूनतम तथा शहरी क्षेत्र के लिए प्रति व्यक्ति 271.70 रुपये सालाना और 22.60 रुपये मासिक न्यूनतम आय का सुझाव दिया. इस तरह उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि उस समय देश की 40 फीसदी ग्रामीण आबादी और शहरी क्षेत्र में 50 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर कर रही थी. वास्तव में गरीबी इन आंकड़ों से सचमुच कहीं अधिक थी.

1977 में बदल गए राजनीतिक हालात
1977 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी और कांग्रेस की पराजय के पीछे आपातकाल की ज्यादतियों के साथ ही महंगाई भी एक बड़ा कारण थी. 24 मार्च 1977 को मोरारजी भाई देसाई ने जनता पार्टी की नई सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. जनता पार्टी के घटकों की खींचतान के चलते मोरारजी देसाई दो साल भी प्रधानमंत्री नहीं रह सके. उनके पद से हटने के बाद 28 जुलाई 1979 को किसान नेता चरण सिंह प्रधानमंत्री जरूर बने, मगर महज 23 दिन बाद ही कांग्रेस के समर्थन वापस ले लेने से उनकी सरकार गिर गई. मोरारजी देसाई और चरण सिंह की सरकारें प्रशासन और कार्यक्रम के स्तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं ला सकीं.

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1979 में योजना आयोग ने बनाई समिति
जनता पार्टी के अल्पकालिक शासन में गरीबी खत्म करने की दिशा में भले ही कोई उल्लेखनीय काम न हो सका, लेकिन 1979 में योजना आयोग द्वारा वाई. के. अलघ की अगुआई में गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में गरीबी का निर्धारण पोषण संबंधी जरूरतों के आधार पर किया जाना चाहिए. इस बीच 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हो गई.जनता पार्टी के बिखरने से विपक्ष भी कमजोर पड़ चुका था. इंदिरा गांधी को सीधे तौर पर कोई राजनीतिक चुनौती नहीं थी. हालांकि गरीबी से लड़ाई खत्म नहीं हुई थी. 1981 की जनगणना के मुताबिक भारत की आबादी 71.54 करोड़ हो गई थी. उस समय देश में 42.9 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर कर रहे थे. यह देश की आबादी का साठ फीसदी था.

जब 26 करोड़ लोगों के पास नहीं था भोजन
साल 1977-78 के 51.2 फीसदी की तुलना में 1999-2000 के आते-आते आधिकारिक तौर पर गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 26.1 फीसदी बताई गई. योजना आयोग ने जुलाई 1999 से जून 2000 के बीच के एनएसएसओ के 55वें दौर के आंकड़े के आधार पर यह आकलन किया था. गरीबी में यह गिरावट वाकई रेखांकित करने वाली थी, लेकिन इसका मतलब यह भी था कि उस समय भी 26 करोड़ लोग दो वक्त का भोजन नहीं जुटा पा रहे थे. यह संख्या उस समय अमेरिका की आबादी 28 करोड़ (वर्ष 2000) से थोड़ी ही कम थी. 

बदलता रहा गरीबी आंकने का पैमाना
यह वही दौर था, जब सितंबर 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने अगले डेढ़ दशक में यानी 2015 तक सबसे गरीब लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए आठ लक्ष्य तय किए थे. जिन्हें मिलेनियम डेवलपमेंट होल्स (सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य) कहा गया. इनमें पहला लक्ष्य ही था, भीषण गरीबी और भूख से मुक्ति. ठीक उसी समय देश में गरीबी की परिभाषा को लेकर नई बहस भी छिड़ गई थी. इस बहस को अर्थशास्त्रियों ने नया आयाम दिया. अगले एक दशक के दौरान गरीबी रेखा को लेकर कई परिभाषाएं सामने आईं, जिनसे देश में गरीबी को आंकने का पैमाना बदलता रहा और गरीबो की संख्या भी कम- ज्यादा होती रही.

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तेंदुलकर समिति ने दिया नया पैमाना
योजना आयोग ने 2005 में गरीबी के आकलन के तरीकों की समीक्षा के लिए जाने-माने अर्थशास्त्री और राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के पूर्व प्रमुख सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति बनाई. सुरेश तेंदुलकर समिति ने खर्च करने की क्षमता को गरीबी को आंकने का पैमाना भी बनाया. सुरेश तेंदुलकर समिति ने गरीबी के पैमाने के लिए जो राशि निर्धारित की, वह चौंकाने वाली थी. उसने 2004-05 के मूल्य के आाधार पर निर्धारित किया कि ग्रामीण क्षेत्र में 446.68 रुपये से कम और शहरी क्षेत्र में 578.8 रुपये के कम कमाने वाले गरीब हैं. 

गरीबी रेखा से नीचे थे 32 करोड़ लोग
इसका मतलब था कि ग्रामीण क्षेत्र में रोजाना प्रति व्यक्ति 14.88 रुपये और शहरी क्षेत्र में रोजाना प्रति व्यक्ति 19.29 रुपये से कम कमाने वाले परिवार गरीब माने गए. इसका यह मतलब भी था कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में रोजाना क्रमश: 14.88 रुपये तथा 19.29 रुपये से अधिक कमाने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर था. तेंदुलकर समिति के आकलन के मुताबिक गरीबी की इस नई रेखा के आधार पर 2004-05 में ग्रामीण भारत की 41 फीसदी आबादी या 32 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे थे.

इस तरह से शहरी क्षेत्र में 27.5 फीसदी आबादी या 8.71 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे थे. यानी उस समय कुल 37.2 फीसदी आबादी या करीब 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे थे. तेंदुलकर समिति ने अपना आकलन उसी पर्चेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी यानी क्रय शक्ति समता) से संबंधित अंतरराष्ट्रीय विनिमय के सिद्धांत के आधार पर किया था. जिसके आधार पर विश्व बैंक ने 2005 में रोजाना 1.25 डॉलर से कम कमाने वाले को गरीबी रेखा से नीचे माना. 2021 में यह बढ़कर 1.99 डॉलर हो गया. 

2009-10 में क्या बना पैमाना
तेंदुलकर समिति ने जो तरीका अपनाया था उसके आधार पर 2009-10 में ग्रामीण क्षेत्र में मासिक 672.8 रुपये यानी रोजाना 22.42 रुपये और शहरी क्षेत्र में मासिक 859.6 रुपये यानी रोजाना 28.6 रुपये या उससे कम कमाने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा के नीचे माना गया. इस नए आकलन से 2009-10 में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों की संख्या घटकर 29.8 फीसदी पर आ गई. यही नहीं 2011-12 में यह और नीचे गिरकर 21.9 फीसदी रह गई. तब यह माना गया कि शहरी क्षेत्र में जो लोग सामानों और सेवाओं पर रोजाना 33.33 रुपये तथा ग्रामीण क्षेत्र में 27.20 रुपये खर्च कर सकते हैं, वे गरीब नहीं हैं.

रंगराजन समिति ने क्या दी रिपोर्ट
वास्तव में यह तस्वीर काफी धुंधली थी. इसका अहसास खुद योजना आयोग को भी था. इसके बाद योजना आयोग ने 2013 में प्रधानमंत्री का आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष सी. रंगराजन की अगुआई में एक नई समिति गठित कर दी. जुलाई 2014 में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में इस समिति ने गरीबी रेखा का निर्धारण करने के लिए पोषण, कपड़ा, आवास का किराया, परिवहन खर्च, शिक्षा के साथ ही गैर खाद्य मदों पर खर्च को भी ध्यान में रखा. समिति ने सुझाव दिया कि ग्रामीण भारत में 27 रुपये रोजाना और शहरी क्षेत्र में 33 रुपये रोजाना से अधिक कमाने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर माना जाए. इस तरह अब गरीबों का एक नया आंकड़ा सामने था. देश की कुल 29.5 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के दायरे में आ गई.

अभी जारी है भूख और गरीबी से लड़ाई
कोरोना महामारी के दौर में केंद्र और राज्य की सरकारों ने गरीबों और वंचितों के लिए सस्ते या फिर मुफ्त अनाज की व्यवस्था की. केंद्र सरकार ने 2020 में 80 करोड़ लोगों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत पांच किलो मुफ्त राशन देने का प्रावधान किया. इस योजना को कई बार बढ़ाया जा चुका है. फिलहाल यह योजना 2028 तक जारी रहेगी. यहि हम 80 करोड़ का आंकड़ा देखें तो यह देश की आबादी का करीब 58 फीसदी होता है. यह आंकड़ा देश के नीति नियंताओं के लिए चिंता का कारण होना चाहिए. यह दिखाता है कि देश की बड़ी आबादी की भूख और गरीबी से लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है.

Tags: Indira Gandhi, PM Modi, Poverty, Poverty Line, Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana

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